Saturday, 21 October 2017

मुक्तक

1222, 1222, 1222, 1222,

न  वो  इनकार  करती  है न वो इकरार करती है,
लगा कर टकटकी मुझ पे नजर से वार करती है,
मुझे  मालूम  है  की  वो जमाने से झिझकती है,
चुरा  कर  वो नजर अपनी मेरा दीदार करती है,

हेमराजसिंह