Saturday, 30 December 2017

मुक्तक

रहे जो  याद सदियों तक मै ऐसी रीत बन जाऊँ,
तु मेरी  हार  बन जाये  मै तेरी  जीत  बन जाऊँ,
जमाना  प्रेम  ग्रंथों  मे  हमेशा  हमको  गाये  गा,
बनो तुम प्रेम की पाती तो मै एक गीत बन जाऊँ,

हेमराज

Thursday, 21 December 2017

मुक्तक

समय के साथ गुजरी वो कहानी छोड आया हूँ,
किसी के पास यादों की निशानी छोड आया हूँ,
कभी मुझको बुलाकर पास सीने से लगाया था
उन्हीं आँखों मे आंसू की रवानी छोड़ आया हूँ

Hemraj Singh Rajput🙏

Saturday, 21 October 2017

मुक्तक

1222, 1222, 1222, 1222,

न  वो  इनकार  करती  है न वो इकरार करती है,
लगा कर टकटकी मुझ पे नजर से वार करती है,
मुझे  मालूम  है  की  वो जमाने से झिझकती है,
चुरा  कर  वो नजर अपनी मेरा दीदार करती है,

हेमराजसिंह

Sunday, 17 September 2017

गजल- तुम बिन

गजल जैसा ही कुछ प्रस्तुत है गजल तो नहीं कह सकता बस एक नजर करे, 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

तुम बिन रहने की आदत डाल रहा हूँ,
मै एक पत्थर मे  चाहत  डाल रहा हूँ,

इस  नामुराद  दिल मे  तुम्हारे झूठे,
पैगाम की झूठी राहत डाल रहा हूँ,

किसी को देख कर बहुत मचलता है ये दिल,
इसमे  थोडी   सी  शराफत  डाल   रहा   हूँ,

हर  रोज  सपने  मे  हदे  टूटती  है,
मै तो सपनो मे सरहद डाल रहा हूँ,

सुना है तुम जख्म सहने के आदि हो,
लो  हेम  मै  भी  आहत  डाल रहा हूँ,

                 हेमराजसिंह राजपूत

Thursday, 24 August 2017

मुक्तक

में सबकुछ हार बेठा हूँ, तुम्हारी इक बनावट पे,
सभी श्रृंगार  फीके  हैं  तुम्हारी एक सजावट पे,
मेरे घर की हो तुम शोभा,मेरे आँगन की तुलसी
हो सभी त्योहार न्योछावर,तुम्हरी मुस्कुराहट  पे,

हेमराजसिंह राजपूत

Sunday, 30 July 2017


तुमसे मिलकर कोई, अब ख्वाइश न रही,
इस जमाने से कोई, अब आजमाइस न रही,

इस कदर प्यार तुमने किया मुझसे उम्र भर शिकायत की कोई अब गुंजाइश न रही,

   हेमराज राजपूत भोपाल 8357009549

Monday, 17 July 2017

गजल

🙏🏻 गुदगुदाती गजल🙏🏻

अब हमको भी मोहब्बत का इजहार होना चाहिए,
तीर जिगर के उस पार होना चाहिए,

बहुत रह लिए किसी के बिन अकेले-अकेले अब
अपना भी घर संसार होना चाहिए,

हर कोई देख पढ लेता है चेहरा हमारा हमको भी
अब अखबार होना चाहिए,

कि, बस एक नजर मे दिल चुरा लेते है हमको भी
ऐसो से अब खबरदार होना चाहिए,

सुना है, कि वो मोहब्बत मे बडे मकवूल है,यार उनको
तो मोहब्बत का अब इश्तेहार होना चाहिए,
      
   (हेमराजसिंह राजपूत)

Tuesday, 11 July 2017

मुक्तक

सोशल साईट पर ऐसी झूठी हमदर्दी न जताईए,
निर्दोषो कि जान गई है कोई ठोस कदम उठाईए,

बात आप बदला लेने कि करते हो
पहले जरा सैनिको कि बंदूको पर लगे
अंकुशो को हटाईए,
             ( हेमराजसिंह राजपूत)
अमरनाथ यात्रा मे मारे गए भक्तो को नमन पूर्वक श्राध्दांजली 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐💐💐💐

Saturday, 24 June 2017

गजल


गजल

तुम्हारे शहर मे ये तमाशा क्यों है,
यहाँ हर शक्स इतना प्यासा क्यो है,

लूट जाती है एक अवला कि आवरु
जब उसे इंसाफ नही तो दिलाशा क्यो है,

देखा है,मेने तुम्हारे शहर के लोगो कि आँखों
मे इतनी भोग-विलासा क्यों हैं,

जो मोक्ष के दौर मे है,ओर जो मोक्ष के द्वारे है,
उनमे ये अभिलाषा क्यो है,

कुछ हद पार कर गए, कुछ करने को है फिर
 भी उनमे इतनी निराशा क्यो है,

जैसे-तैसे बचते बचाते पहुँच गए, मंजिलो पर
 अपनी न जाने फिर भी ये हताशा क्यों है,
               (हेमराजसिंह )
www Hemrajsingh Rajput sad love poems com

Friday, 9 June 2017

वो सुलगती आग को भी हवा देता था,
हर गुनाह मे भी वो गवाह देता था,

उसमे ओर मुझमें बस फर्क था इतना
वो दर्द कि दवां देता था मै दर्द को
दवा देता था,
                    (हेमराजसिंह राजपूत)
www Hemrajsingh rajput love sad poems com

Tuesday, 2 May 2017

गजल

मैं जब तक सफर मे रहा,
तब तक सब कि खबर मे रहा,

और जब मै पा गया मुकाम-ए-
मंजिल तो हर एक के जिक्र मे रहा,

मैं कैसे वया करु अपना दर्द पर अपनो
से बिछड कर बडा हिज्र मे रहा,

कुछ मजबूरीया थी मेरी जो मै तुमको
ऐसे हालातों मे छोडकर गया पर सच
कहू मे बडा फिक्र मे रहा,

कई मेरे अपने मुझे दिलासे पर दिलासे
देते गए मै भी बहुत सब्र मे रहा,

वो कहते थे कि हम तुम्हारी यादों कि
छावं मे रहते थे मने भी कह दिया कि
मे तुम्हारी यादों के शजर मे रहा,
                    (हेमराजसिंह राजपूत)
www.Hemrajsingh Rajput. blogspot. in

Friday, 21 April 2017

मुक्तक

हर रोज दिल शायराना नही होता,
हर किसी से अपना याराना नहीं होता,

हम किसी-किसी को पसंद आते है
हर किसी से दिल का नजराना नहीं होता,
                            (हेमराजसिंह राजपूत)

Wednesday, 19 April 2017

मुक्तक

आज फिर हमने मन कि मानी,
आँखों ने भी फिर कि बेईमानी,

लोग बातो को दिल पर लगा लेते
है हमने तो बातो पर दिल लगाकर
मानी,
                     (हेमराजसिंह राजपूत)

Friday, 14 April 2017

गजल

गजल-शब्दों को बातों मे रहने दे तो अच्छा है,

शब्दों को बातों मे रहने दे तो अच्छा है,
चाँद को रातों मे रहने दे तो अच्छा है,

बहुत ही धोखे बाज है ये दुनिया तेरे
हाथों को मेरे हाथों मे रहने दे तो
अच्छा है,

तेरे अपनो के रिश्तों से अलग मेरे दिल
का रिश्ता है इसे रिश्ते नातो मे रहने दे
तो अच्छा है,

तेरा प्यार बाँटने का सिलसिला बडा
अजीब सा है  ''हेमराज'' इसे तू खैरातो
मे रहने दे तो अच्छा है,

तेरे मेरे गिले-शिकवे के चर्चे गैरो से
क्यों करता है इन्हें मुलकातो मे रहने
दे तो अच्छा है,

ये तेरा बिन मौसम बरसने का अंदाज
रास नहीं आया "हेमराज" इसे तू बरसातो मे रहने दे तो अच्छा है,

                    (हेमराजसिंह राजपूत)

गजल-शब्दों को बातों मे रहने दे तो अच्छा है,

शब्दों को बातों मे रहने दे तो अच्छा है,
चाँद को रातों मे रहने दे तो अच्छा है,

बहुत ही धोखे बाज है ये दुनिया तेरे
हाथों को मेरे हाथों मे रहने दे तो
अच्छा है,

तेरे अपनो के रिश्तों से अलग मेरे दिल
का रिश्ता है इसे रिश्ते नातो मे रहने दे
तो अच्छा है,

तेरा प्यार बाँटने का सिलसिला बडा
अजीब सा है  ''हेमराज'' इसे तू खैरातो
मे रहने दे तो अच्छा है,

तेरे मेरे गिले-शिकवे के चर्चे गैरो से
क्यों करता है इन्हें मुलकातो मे रहने
दे तो अच्छा है,

ये तेरा बिन मौसम बरसने का अंदाज
रास नहीं आया "हेमराज" इसे तू बरसातो मे रहने दे तो अच्छा है,

                    (हेमराजसिंह राजपूत)

Tuesday, 4 April 2017

गजल-प्रेम कि राहे

प्रेम कि राहे साफ होती जा रही है,
हमारी सब गलतियां माफ होती जा रही है,

ये नजरों का धोका है,या धोका नजरों को है
यहाँ मोहब्बते अपने आप होती जा रही है,

जो हमसे कभी खफा-खफा रहते थे आज
उनकी महोब्बते बे-हिसाब होती जा रही है,

मेरी पतंग उस बेबफा के छत पर न उलझे तो
अच्छा होगा पर ये कमवखत हवा खिलाफ
होती जा रही है,

न जाने तुम्हारी आवाज मे क्या जादू है
तुम्हारे गुनगुनाने से मेरी हर गजल लाजवाब
होती जा रही है,

(हेमराजसिंह राजपूत)

Saturday, 1 April 2017

कविता-माँ लिखती है खत मै

कविता-माँ लिखती है खत मे,

माँ लिखती है, खत मे,
कि बेटा दरार आ गई है छत मे,

तेरे जाने से खुशियां चली गई है
आंगन से,
अब तो लौट कर आजा किसी
बहाने से,

रक्षाबंधन पर तेरी बहन थाली
सजाए आस लगाए बैठी रहती है,
मन ही मन तुझे राखी बांधने कि
प्यास लगाए बैठी रहती है,

तेरे पिता अंदर ही अंदर टूट
चुके है,
अब उनकी आँखों से आंसू छूट
चुके है,

तुझको पता नहीं है तेरे पिता ने
अब छडी पकड ली है,
तेरे आने के इंतजार मे उन्होंने
अब घडी पकड ली  है,

तेरा भाई तुझ बिन अकेला उदास
रहता है,
लगता जैसे गम कि दुनिया के पास
रहता है,

तेरी दादी की बुढी आँखें सुबहा-
शाम रास्ता तेरा निहारती रहती है,
सोते हुए अक्सर ख्वाबो मे बस
तुझे ही पुकारती रहती है,

गांव के चौपाल मे शाम के वक्त तेरे
दोस्त तेरी ही जिक्र करते है,
न जाने कहाँ होगा कैसा होगा एक-
दुसरे से कर बात तेरी ही फिक्र करते है,

आते-जाते गांव के बडे बुजुर्ग तेरी
खबर-बतर पूंछते रहते है,
जो ज्ञानी विद्वान है वो तेरे जाने
वाले दिन का नक्षत्र पूंछते रहते है,

ऐ-मेरे बेटे जिंदगी के कुछ दिन
ओर बचे है तेरे साथ रहकर काटना
चाहते है,
बहुत रह लिए तुझ बिन अकेले-अकेले
अब साथ रहकर खुशियां वांटना
चाहते है,

खत मिलते ही तू तुरंत निकल आना,
बहन कि राखी को,भाई के अकेले
पन को,पिता की छडी को,दोस्तो कि
फिक्र को,दादी की पुकाइ को कुछ तो
जबाब दे जाना,

मेरा क्या है मै तो हर रोज जीती मरती
हूँ,
जिस दिन से तू गया है उस दिन से
आजतक तेरे वियोग मे मरती रहती
हूँ,

तू लौटकर आए तो हमको जीने कि
चाहा मिल जाए,
तुझ बिन जो भटक चुके है रास्ते वो
राह मिल जाए,

अब मे तुझको क्या-क्या बताऊ सब
कुछ तो तू जानता है,
घर कि हालत तुझसे छुपि नही  सब
कुछ तो तू पहचानता है,

मेरा आर्शीवाद सदैव तेरे साथ रहे दिन
दौगुना रात चौकनी हो,
मेरे हिस्से कि खशियां तेरी हो ओर तेरे
हिस्से कि परेशानी चाहे मुझे भोगनी हो,
                (हेमराजसिंह राजपूत)

कविता-माँ लिखती है खत मे,

माँ लिखती है, खत मे,
कि बेठा दरार आ गई है छत मे,


तेरे जाने से खुशियां चली गई है
आंगन से,
अब तो लौट कर आजा किसी
बहाने से,


रक्षाबंधन पर तेरी बहन थाली
सजाए आस लगाए बैठी रहती है,
मन ही मन तुझे राखी बांधने कि
प्यास लगाए बैठी रहती है,


तेरे पिता अंदर ही अंदर टूट
चुके है,
अब उनकी आँखों से आंसू छूट
चुके है,


तुझको पता नहीं है तेरे पिता ने
अब छडी पकड ली है,
तेरे आने के इंतजार मे उन्होंने
अब घडी पकड ली  है,


तेरा भाई तुझ बिन अकेला उदास
रहता है,
लगता जैसे गम कि दुनिया के पास
रहता है,


तेरी दादी की बुढी आँखें सुबहा-
शाम रास्ता तेरा निहारती रहती है,
सोते हुए अक्सर ख्वाबो मे बस
तुझे ही पुकारती रहती है,

गांव के चौपाल मे शाम के वक्त तेरे
दोस्त तेरी ही जिक्र करते है,
न जाने कहाँ होगा कैसा होगा एक-
दुसरे से कर बात तेरी ही फिक्र करते है,


आते-जाते गांव के बडे बुजुर्ग तेरी
खबर-बतर पूंछते रहते है,
जो ज्ञानी विध्दवान है वो तेरे जाने
वाले दिन का नक्षत्र पूंछते रहते है,

ऐ-मेरे बेटे जिंदगी के कुछ दिन
ओर बचे है तेरे साथ रहकर काटना
चाहते है,
बहुत रह लिए तुझ बिन अकेले-अकेले
अब साथ रहकर खुशियां वांटना
चाहते है,

खत मिलते ही तू तुरंत निकल आना,
बहन कि राखी को,भाई के अकेले
पन को,पिता की छडी को,दोस्तो कि
फिक्र को,दादी की पुकाइ को कुछ तो
जबाब दे जाना,

मेरा क्या है मै तो हर रोज जीती मरती
हूँ,
जिस दिन से तू गया है उस दिन से
आजतक तेरे वियोग मे मरती रहती
हूँ,

तू लौटकर आए तो हमको जीने कि
चाहा मिल जाए,
तुझ बिन जो भटक चुके है रास्ते वो
राह मिल जाए,

अब मे तुझको क्या-क्या बताऊ सब
कुछ तो तू जानता है,
घर कि हालत तुझसे छुपि नही  सब
कुछ तो तू पहचानता है,

मेरा आर्शीवाद सदैव तेरे साथ रहे दिन
दौगुना रात चौकनी हो,
मेरे हिस्से कि खशियां तेरी हो ओर तेरे
हिस्से कि परेशानी चाहे मुझे भोगनी हो,
                (हेमराजसिंह राजपूत)

Tuesday, 28 March 2017

चाहत के सब फसाने झूठे थे,

गजल-चाहत के सब फंसाने झूठे थे,

चाहत  के  सब  फंसाने  झूठे थे,
जब उनके हाथों से मेरे हाथ छूटे थे,

मे चाहकर भी उनको थामकर
साथ चल न सका मेरी तकदीर
के सब सितारे मुझसे रूठे थे,

उनको एक अजीब सा नशा
रहता था तीन शब्दों कि दौलत
का इसलिए सब रिश्ते टूटे थे,

कहते है कि आईने सब कुछ
साफ दिखाते है जिसमें हम
दोनो के चेहरे थे वो आईने फूटे थे,

                    (हेमराजसिंह राजपूत)

Sunday, 26 March 2017

कविता-तुम मिली तो लगा,

कविता-तुम मिली तो लगा

तुम मिली तो लगा कि मुझे मेरी तकदीर मिल गई,
जन्मो से गुम थी मेरे हाथों  कि वो लकिर मिल गई,

तुम मिली तो लगा कि मेरी मुरझाई जिंदगी खिल गई,
जमाने पहले जो भटक गई थी मुझसे वो खुशियां मिल गई,

तुम मिली तो लगा कि मेरा हमसाया मिल गया,
जो एक चूक से भटक गया था वो विसराया मिल गया,

तुम से मिला तो लगा कि मै खुद ही खुद को मिल गया,
संसार कि सब माया मोह को छोड मै बुध्द को मिल गया,

जिंदगी के सफर मे मैं रुक-रुक कर चलता रहा,
तुम्हारे स्वाभिमान के खातिर मै जमाने   से झुक-झुक कर चलता रहा,

तुम से मिलकर मन मेरा मनभावन हुआ,
मेरा पतझड जीवन फिर से एक सावन हुआ,

तुम मिली तो मेरी वेजान श्वांसो मे श्वास आ गई,
जो टूटी थी जाने कब से ह्रदय मे वो आस आ गई,

मैं तुम्हें अल्पकाल के लिए नहीं दीर्घकाल के लिए पाना चहाता हूँ,
मेरे जीवन मे पडे प्रेम अकाल के लिए पाना चहाता हूँ,

                   (हेमराजसिंह राजपूत)

Sunday, 19 March 2017

मुक्तक

तुम्हारी पुरानी यादों को लिए बैठा हूँ,

तुम्हारे आने के सपने सँजोए बैठा हूँ,

आकर देख लो बीच भँवर मे छोड़ कर गए थे मै किनारा लिए बैठा हूँ
             ......@हेमराज सिंह.....

मुक्तक

तुम्हारी पुरानी यादों को लिए बैठा हूँ,

तुम्हारे आने के सपने सँजोए बैठा हूँ,

आकर देख लो बीच भँवर मे छोड़ कर गए थे मै किनारा लिए बैठा हूँ
             ......@हेमराज सिंह.....

Saturday, 18 March 2017

शर्म का गहना,पहन के आना,

आर.के.डी.एफ. विश्वविद्यालय मे फ्रेशर पार्टि के द्वौरान ए क हास्य गीत की प्रस्तुति गीत का शीर्षक -शर्म का गहना                                                  
  शर्म का गहना,पहन के आना,ओमेरी जाने जाना,              ये दिल मेरा हिन्दुस्तानी है,पुरे रस्मो रिवाजों मे आना,                                                                                          नैन झुकाय घुंघट डाले मन ही मन जो शर्माए,                   ऐसी नई नवेली दुल्हन मेरे जीवन मे आ जाए,                                                                                                      न आधुनिक नारी न फैशनेवल नारी रुप मे आना,                  आना तो केवल   भारतीय नारी रुप मे आना,                                                                                                     मेरे जीवन मे तुम सीता सावित्री रुप मे आना,                     ये दिल मेरा हिन्दुस्तानी है पुरे रस्मो रिवाजों मे आना,                                                                                          व्हाटसएप, अव्हाटसएप,फेसबुक ,एसवुक, चलाने की        न उसे विमारी हो,                                                         घर गृहस्थी के सारे काम काज करने कि उसमें                  अदाकारी हो,                                                                                                                                                A G,O G, सुनो जी ही मुझे कहकर बुलाए,                      जीवन के सारे कष्टों को वो सह सह कर भुलाए,                                                                                                    लाल जोडा पहने पुरे प्रेम भरे मिजाजो मे आना,                    ये दिल मेरा हिन्दुस्तानी है पूरे रस्मो रिवाजों मे आना,                                                                                              मेरे मात-पिता को वो भगवानो सा पूजे,                              इसके अलावा कोई ओर बात उसे न सुजे,                                                                                                      सातो फेरो के वो सातो वचन निभाना जाने,                     मेरे नाम से ही उसको सारा जमाना जाने,                                                                                                           मेरे सुखमय जीवन मे तुम पूरे भारतीय संस्कारों मे आना,      ये दिल मेरा हिन्दुस्तानी है पूरे रस्मो रिवाजों मे आना,                                                                                          मुझ कवि को भी ऐसे पढे कोई कवियत्रि ,                         ।जैसे पँडितजी पढे कोई जन्म पत्रि,                                                                                                                 मेरे वेरँग सपनो मे जो रँग भर दे,                                     इतना प्रेम करे जो मुझको तंग कर दे,                                                                                                               सब गुणों से परिपक्व मिश्रित रुप मे आना,                          ये दिल मेरा हिन्दुस्तानी है पूरे रस्मो रिवाजों मे आना,                                        (लेखक~हेमराजसिंह )

माँ

:-माँ-: 
"माँ" तुम्हारा मुझ पर बडा एहसान हुआ ,
तब जाकर कही मै इंसान हुआ,

"माँ" अगर मे अपनी देह की चमडी से तुम्हारे चरणों कि पादुका बना दूँ तो तुम्हारे ऋण से उऋण नही नही हो पाऊँगा,
मै चाहे कितना भी बडा दानी क्यों न बन जाऊँ लेकिन कुंति पुत्र कर्ण नही हो पाऊँगा,

"माँ" मेरी सारी शौहरत रोडी है माँ शब्द के आगे,
"माँ" मेरी सारी धन दौलत कौडी है माँ शब्द के मूल्य के आगे,

"माँ" जब तुम मेरे नजदीक होती हो तो खुद को परेशानियों से मुक्त पाता हूँ,
"माँ" जब तुम मुझसे दूर होती हो तो
मे खुद को तकलीफ़ो मे युक्त पाता हूँ,

"माँ" मे आज भले ही जमाने के संग-संग तेजी से चल रहा हूँ लेकिन तुम्हारी ऊँगली पकड कर चलना सीखा है,
क्रोध के आवेश मे शब्दों से लगे घावो पर तुमसे ही तो औषधि मलना सीखा है,

"माँ" आज क्षृष्टि के समस्त व्यंजन मेरे लिए अस्वादिष्ट है उन चटनी रोटी के आगे जो तुम पाठशाला जाते वक्त मेरे वस्ते मे रखती थी,
जब तक लौटता न था पाठशाला से घर तब तक तुम मेरा दरवाजे पर खडी होकर रास्ता तकती थी,

"माँ" ओर ये संसार के सारे पेय पदार्थ मेरे लिए बिष है तुम्हारे स्थन के अमृत पान के समक्ष,
जब मुझसे कोई ऋटि हो जाती थी तब घर भर मेरा विपक्ष करता एक तुम ही थी माँ जो करती थी मेरा पक्ष,

"माँ" इस आधुनिक युग के आधुनिक उपकरण पंखा, कूलर, ए.सी., मुझे वो शीतलता प्रदान नही कर सकती जब तुम मुझे अपनी गोद मे लेकर साडी के पल्लू से हवा किया करती थी,
ओर ये आज दुनिया कि सारी औषधियां वेकार है तुम्हारी उस औषधि के मुकाबले जब तुम बुरी नजर से बचाने के लिए मुझको काजल के टीके 
कि दवा किया करती थी,(हेमराज सिंह राजपूत)

Sad love poems

                                ~कविता~              
  तुम कुछ भी कह लो पर तुमको  मुझसे वो प्यार नही  हैं,
आँखों मे वो चमक बार नहीं है वो खुशियों से भरा घर बार नही है,

तुम्हारी बातो मे न अब वो चिंता रही,
जब तुम कहती थी कि तुम बिन न जाने मे कैसै जिंदा रही,

जब तुम पल-पल को कल-कल मे जीती थी,
गम मेरी जुदाई का हरपल भर प्याले पीति थी,

तुम्हारी मिठी सी भारी-भारी बातों मे अब वो भार नही है,
तुम कुछ भी कह लो पर तुमको मुझसे वो प्यार नही हैं,

दिन-दिन भर,आँखों मे आँसू भर,तुम याद मुझे किया करती थी,
जब मुझसे मिलती थी,तो कहती थी,तुम क्या जानो तुम बिन मै कैसै जिया करती थी,

कालेज मे तुम्हारी मेरी चर्चाओ का अब वो सार  नही हैं,
तुम कुछ भी कह लो पर तुमको मुझसे वो प्यार नही हैं,

वे परवाही मे भी जब तुम मेरी परवाह करती थी,
मेरे खातिर सारी दुनिया को रूसवाह करती थी,

महेंदी वाले हाथों मे जब नाम मेरा छुपा होता था,
तुम मुझे दिखाने चली आती थी चाहे सारा घर तुमसे खफा होता था,

इस वक्त मे उस प्यारे वक्त कि अब वो पलट बार नहीं हैं,
तुम कुछ भी कह लो पर तुमको मुझसे वो प्यार नही है,
                      (हेमराज सिंह)