Saturday, 24 June 2017

गजल


गजल

तुम्हारे शहर मे ये तमाशा क्यों है,
यहाँ हर शक्स इतना प्यासा क्यो है,

लूट जाती है एक अवला कि आवरु
जब उसे इंसाफ नही तो दिलाशा क्यो है,

देखा है,मेने तुम्हारे शहर के लोगो कि आँखों
मे इतनी भोग-विलासा क्यों हैं,

जो मोक्ष के दौर मे है,ओर जो मोक्ष के द्वारे है,
उनमे ये अभिलाषा क्यो है,

कुछ हद पार कर गए, कुछ करने को है फिर
 भी उनमे इतनी निराशा क्यो है,

जैसे-तैसे बचते बचाते पहुँच गए, मंजिलो पर
 अपनी न जाने फिर भी ये हताशा क्यों है,
               (हेमराजसिंह )
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Friday, 9 June 2017

वो सुलगती आग को भी हवा देता था,
हर गुनाह मे भी वो गवाह देता था,

उसमे ओर मुझमें बस फर्क था इतना
वो दर्द कि दवां देता था मै दर्द को
दवा देता था,
                    (हेमराजसिंह राजपूत)
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