कविता-तुम मिली तो लगा
तुम मिली तो लगा कि मुझे मेरी तकदीर मिल गई,
जन्मो से गुम थी मेरे हाथों कि वो लकिर मिल गई,
तुम मिली तो लगा कि मेरी मुरझाई जिंदगी खिल गई,
जमाने पहले जो भटक गई थी मुझसे वो खुशियां मिल गई,
तुम मिली तो लगा कि मेरा हमसाया मिल गया,
जो एक चूक से भटक गया था वो विसराया मिल गया,
तुम से मिला तो लगा कि मै खुद ही खुद को मिल गया,
संसार कि सब माया मोह को छोड मै बुध्द को मिल गया,
जिंदगी के सफर मे मैं रुक-रुक कर चलता रहा,
तुम्हारे स्वाभिमान के खातिर मै जमाने से झुक-झुक कर चलता रहा,
तुम से मिलकर मन मेरा मनभावन हुआ,
मेरा पतझड जीवन फिर से एक सावन हुआ,
तुम मिली तो मेरी वेजान श्वांसो मे श्वास आ गई,
जो टूटी थी जाने कब से ह्रदय मे वो आस आ गई,
मैं तुम्हें अल्पकाल के लिए नहीं दीर्घकाल के लिए पाना चहाता हूँ,
मेरे जीवन मे पडे प्रेम अकाल के लिए पाना चहाता हूँ,
(हेमराजसिंह राजपूत)
तुम मिली तो लगा कि मुझे मेरी तकदीर मिल गई,
जन्मो से गुम थी मेरे हाथों कि वो लकिर मिल गई,
तुम मिली तो लगा कि मेरी मुरझाई जिंदगी खिल गई,
जमाने पहले जो भटक गई थी मुझसे वो खुशियां मिल गई,
तुम मिली तो लगा कि मेरा हमसाया मिल गया,
जो एक चूक से भटक गया था वो विसराया मिल गया,
तुम से मिला तो लगा कि मै खुद ही खुद को मिल गया,
संसार कि सब माया मोह को छोड मै बुध्द को मिल गया,
जिंदगी के सफर मे मैं रुक-रुक कर चलता रहा,
तुम्हारे स्वाभिमान के खातिर मै जमाने से झुक-झुक कर चलता रहा,
तुम से मिलकर मन मेरा मनभावन हुआ,
मेरा पतझड जीवन फिर से एक सावन हुआ,
तुम मिली तो मेरी वेजान श्वांसो मे श्वास आ गई,
जो टूटी थी जाने कब से ह्रदय मे वो आस आ गई,
मैं तुम्हें अल्पकाल के लिए नहीं दीर्घकाल के लिए पाना चहाता हूँ,
मेरे जीवन मे पडे प्रेम अकाल के लिए पाना चहाता हूँ,
(हेमराजसिंह राजपूत)
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